सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण मामले में मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला
किया और इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र का फैसला दशकों पुराने
आंकड़ों पर आधारित है और आरक्षण के लिए पिछड़ेपन का आधार सामाजिक होना
चाहिए, न कि आर्थिक या शैक्षणिक। कोर्ट ने कहा कि सरकार को ट्रांसजेंडर
जैसे नए पिछड़े ग्रुप को ओबीसी के तहत लाना चाहिए।
पिछले साल मार्च
में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार ने नौ राज्यों के
जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी लिस्ट में शामिल किया था। इसके आधार
पर जाट भी नौकरी और उच्च शिक्षा में ओबीसी वर्ग को मिलने वाले 27 फीसदी
आरक्षण के हक़दार बन गए थे।
इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट
में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार ने भी जाटों को
ओबीसी आरक्षण की सुविधा दिए जाने के फैसले का समर्थन किया है। लोकसभा
चुनाव से पहले 4 मार्च 2014 को किए गए इस फैसले में दिल्ली, उत्तराखंड,
उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल, बिहार, मध्य प्रदेश, और हरियाणा के अलावा
राजस्स्थान (भरतपुर और धौलपुर) के जाटों को केंद्रीय सूची में शामिल किया
था। -
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